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राजस्थान का इतिहास – भाग 6- पुरालेखीय सामग्री / ऐतिहासिक स्त्रोत

b. पुरालेखीय सामग्री / ऐतिहासिक स्त्रोत

II सिक्के

  • किसी भी राज्य की आर्थिक , सामाजिक , ऐतिहासिक , भौगोलिक एवं सांस्कृतिक स्थिति की जानकारी के लिए सिक्के एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्त्रोत हैं I
  • सिक्कों के द्वारा किसी शासक की रुचियों, उपलब्ध्दियों तथा उपनाम आदि की जानकारी भी मिलती है I
  • सिक्कों का अध्ययन ‘मुद्राशास्त्र’ एवं ‘Numismatics’ कहलाता है I
  • वैदिक साहित्य में ‘निष्क’, ‘शतमान’ एवं ‘हिरन्यपिंड’ नाम के तीन सिक्कों का उल्लेख है किन्तु इनके अवशेष आज तक प्राप्त नही हुए I
  • भारत में लेख वाले सिक्कों का सर्वप्रथम प्रचलन ‘इंडो-ग्रीक’ शासकों द्वारा किया गया था I ये सिक्के चाँदी से निर्मित थे I
  • भारत में सर्वप्रथम स्वर्ण सिक्के कुषाण शासक ‘विमकद्फिसस’ द्वारा चलाये गए थे I
  • राजस्थान में सर्वप्रथम मेवाड़ रियासत में स्वर्ण सिक्के चलाये गए थे जिसका श्रेय बप्पा रावल को जाता है I
  • सिक्कों का सर्वप्रथम व्यापक अध्ययन ‘कैब’ नामक विदेशी यात्री द्वारा अपनी पुस्तक ‘The Currencies of the Hindu States of Rajputana’ (1893 A.D.) में प्रस्तुत किया गया I
आहत सिक्के
  • अन्य नाम : चिन्हित सिक्के
  • पंचमार्क सिक्के : ऐसे आहत सिक्के जो चाँदी से निर्मित होते थे , पंचमार्क सिक्के कहलाते थे I
  • पंचमार्क सिक्कों का समीकरण साहित्य में उल्लिखित ‘काषार्पण’ से किया गया है I
  • आहत सिक्के मुख्य रूप से चाँदी तथा आंशिक रूप से तांबे से निर्मित होते थे I इन पर किसी शासक का चित्र या कोई लेख नहीं होता था I
  • ये राजस्थान में पाए गए प्राचीनतम सिक्के हैं जिनकी आयु लगभग छठी शताब्दी ई.पू. मानी गयी है I
  • राजस्थान में आहत सिक्के – रैढ (टोंक), बैराठ (जयपुर), सांभर (जयपुर) तथा नगरी ( चित्तौड़गढ़ ) में मिले हैं I
पंचमार्क सिक्के

राजस्थान में प्राचीन सिक्कों का भंडार

रैढ (टोंक ) :

  • टोंक जिले में ढील नदी के किनारे रैढ नामक स्थल से लगभग 3075 चाँदी की पंचमार्क मुद्राएँ मिली हैं जो की भारत में अब तक मिला सिक्कों का सबसे विशाल भंडार है I
  • रैढ से प्राप्त पंचमार्क सिक्के चाँदी से निर्मित तथा 32 रत्ती के हैं I इन पर सूर्य, तीर, मछली, पौधा, पशु आदि की आकृति का अंकन है I
  • इनका प्राचीन नाम ‘धरण’ एवं ‘पण’ है I
  • गण : ये रैढ से प्राप्त तांबे की मुद्राएँ हैं I
  • सेनापति मुद्रा : रैढ से छह सेनापति मुद्राएँ मिली हैं जिनमे से पांच चौकोर व एक गोल है I इन पर नदी का चित्र बना है तथा ‘ वच्छ्घोश ‘ अंकित है I

रंगमहल ( हनुमानगढ़ ) :

  • यहाँ से लगभग 105 सिक्के मिले हैं जिनमें से अधिकतर कुषाण काल की हैं I इन्ही कुषाण कालीन सिक्कों को ‘मुरंडा’ कहा गया है I

आहड़ (उदयपुर) :

  • आहड़ से तांबे के छह सिक्के मिले हैं इनमें एक चौकोर तथा पांच गोल हैं I
  • एक सिक्के पर त्रिशूल अंकित है I
  • आहड़ से इंडो ग्रीक सिक्के भी मिले हैं I

नगर (टोंक) :

  • टोंक जिले की उनियारा तहसील के समीप स्थित नगर नामक स्थान मालव सभ्यता का एक प्रमुख स्थल है I
  • यहाँ से लगभग 6 हज़ार तांबे के सिक्के मिले हैं जिनका भर कम एवं आकार छोटा है I इन सिक्कों पर चालीस मालव सरदारों के नाम अंकित हैं I

राजस्थान की प्रमुख रियासतों के सिक्के

आमेर/जयपुर रियासत के सिक्के

झाडशाही सिक्का

  • जयपुर रियासत की अपनी टकसाल थी जहाँ के सिक्के ‘झाडशाही’ सिक्के कहलाते थे I
  • सिक्कों को ‘झाडशाही’ कहने की वजह थी उनके उपर ‘छह टहनियों का एक गुच्छ’ अंकित होना I
  • ये टहनियां कचनार के वृक्ष की थीं I
  • ज्ञातव्य है की जयपुर रियासत का कछवाहा वंश, भगवान राम के पुत्र ‘कुश’ से अपनी उत्पत्ति मानता है , चूंकि राजा राम के ध्वज में कचनार का अंकन था अतः इसी को सम्मान स्वरुप जयपुर टकसाल का प्रतीक बनाया और सिक्कों पर अंकित किया गया I
  • सिक्के के दूसरी ओर मछली बनी होती थी I
  • झाडशाही सिक्का ‘तांबे से निर्मित था I

हाली सिक्का

  • यह सिक्का राजा माधो सिंह द्वारा चलाया गया था I
मेवाड़ रियासत के सिक्के
  • द्रम/रूपक : मेवाड़ में चलने वाले इंडो ग्रीक शैली के चाँदी के सिक्के
  • काषार्पण : मेवाड़ में प्रचलित इंडो ग्रीक शैली का तांबे का सिक्का
  • ढींगला : चित्तोड़ में प्रचलित चाँदी तथा तांबे की आहत मुद्राएँ
  • चित्तोड़ के ‘नगरी’ से इस प्रकार की मुद्राएँ मिली हैं I
  • गधिया/गधैय्या मुद्रा : मेवाड़ में हूण शासकों द्वारा चलाये गए गधे की आकृति के सिक्के
  • चान्दौडी : महाराणा स्वरुप सिंह के काल में प्रचलित ‘सोने का सिक्का’
  • ज्ञातव्य है की मेवाड़ में सर्वप्रथम ‘बप्पा रावल’ के द्वारा सोने का सिक्का चलाया गया था I
  • स्वरूप्शाही सिक्का : महाराणा स्वरुप सिंह द्वारा प्रचलित सिक्का जिसके एक ओर ‘चित्रकूट उदयपुर’ तथा दूसरी ओर ‘दोस्तिलंघना’ अंकित था I
  • पदमशाही : मेवाड़ रियासत के सलूम्बर ठिकाने की चाँदी की मुद्रा
  • शाह आलमी : चित्तोड़ में चलने वाला चाँदी का रुपया ( सिक्का नहीं )
  • ग्यारसंद्रा : मेवाड़ रियासत के शाहपुरा ठिकाने के सोने चाँदी के सिक्के
  • माधोशाही : शाहपुरा ठिकाने के तांबे के सिक्के
  • मुग़लों से संधि के पश्चात् मेवाड़ की सभी शाही टकसालें बंद करवा दी गईं I तत्पश्चात ‘सिक्का एलची’, ‘चित्तौड़ी’, ‘भिलाडी’, त्रिशुलिया’ तथा ‘उदयपुरी रूपया’ प्रचलन में आया I
मारवाड़ रियासत के सिक्के
  • मारवाड़ रियासत के प्राचीन सिक्के ‘पंचमार्क्ड सिक्के’ कहलाते थे I
  • मारवाड़ में भी मेवाड़ के समान ‘गधिया मुद्रा’ प्रचलित थी I
  • मारवाड़ में सिक्कों की ढलाई के लिए जोधपुर, नागौर, पाली तथा सोजत में टकसालें थीं I
  • गजशाही सिक्के : मारवाड़ में प्रचलित गढ़वाली शैली के सिक्के
  • मोहर : यह जोधपुर टकसाल में बनने वाला सोने का सिक्का था I
  • विजयशाही : 18वीं सदी में महाराजा विजयसिंह द्वारा प्रचलित सिक्का
  • लल्लुलिया रुपया : सोजत में प्रचलित
  • सोजत की टकसाल में बनने वाले सिक्कों पर ‘श्री माताजी’ एवं ‘श्री महादेव’ उत्कीर्ण होता था ।
  • मारवाड़ में प्रचलित अन्य सिक्के : लिल्लुलिया, लल्लूशाही, रुरुरिया, भीमशाही, दब्बुशाही, तख्तशाही
अन्य प्रमुख रियासतों के सिक्के
रियासत का नाम प्रचलित सिक्कों के नाम
बीकानेर गजशाही
धौलपुर तमन्चाशाही
बूंदी ग्यारह सना पुराना रुपया कटारशाही चेहरे शाही हाली राव शाही
कोटा मदनशाही गुमानशाही लक्ष्मणशाही मुहम्मद बीदवतशाही
झालावाड़ मदनशाही पृथ्वीशाही
जैसलमेर मुहम्मदशाही अखैशाही डोडीया
अलवर रावशाही (चाँदी) रावशाही रक्का (तांबा)
बांसवाड़ा लक्ष्मणशाही सालिमशाही
प्रतापगढ़ आलमशाही सालिमशाही नया सालिमशाही
डूंगरपुर उदयशाही
करौली माणिकशाही कटारशाही
भरतपुर शाह आलम

संकलनकर्ता – श्रीमती (डॉ) राखी सिंह, एमए (समाजशास्त्र, इतिहास), शोधशास्त्री राजस्थान विश्व विध्यालय

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