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राजस्थान का इतिहास- भाग 5 – पुरालेखीय सामग्री/ऐतिहासिक स्त्रोत

राखी सिंह, एमए, समाजशास्त्र (गोल्ड मेडलिस्ट), एमए इतिहास, रिसर्च स्कॉलर, राजस्थान विश्वविध्यालय

राजस्थान के महत्वपूर्ण शिलालेख

शिलालेख से तात्पर्य है किसी भवन, मंदिर, दुर्ग, बावड़ी, महल आदि की दीवारों प्रतिमाओं, स्तंभों, पत्थरों आदि पर उत्कीर्ण लेख I राजस्थान में बड़ी संख्या में शिलालेख मिले हैं जो प्रदेश के इतिहास को जानने के विश्वसनीय स्त्रोत हैं I सम्राट अशोक के सभी शिलालेख ब्राह्मी भाषा एवं खरोष्ठी लिपि में हैं I परवर्ती काल के शिलालेखों की भाषा संस्कृत एवं राजस्थानी है I मुस्लिम शासकों के शिलालेख फारसी एवं अरबी भाषा में है Iजब शिलालेख किसी राजा या व्यक्ति विशेष के बारे में संपूर्ण जानकारी देते हैं तो उनको प्रशस्ति कहा जाता है I

ऐतिहासिक दृष्टि से राजस्थान के महत्वपूर्ण शिलालेखों की जानकारी इस प्रकार है :

  • गोठ मांगलोद शिलालेख :
  • नागौर के गोठ मांगलोद में स्थित दधिमति माता के मंदिर में उत्कीर्ण
  • 608 ई. में उत्कीर्ण
  • ‘राजस्थान में प्राप्त सबसे प्राचीन शिलालेख’
  • अपराजित का शिलालेख :
  • चित्तौड़ के कुड़ेश्वर गाँव स्थित एक मंदिर की दीवार पर अंकित
  • 661 ई. में उत्कीर्ण
  • भाषा- संस्कृत
  • लिपि- कुटिल
  • इसमें सातवीं शती के मेवाड़ की धामिक स्थिति तथा विष्णु मंदिर के निर्माण के प्रचलन का उल्लेख है I
  • मंडोर का शिलालेख :
  • मंडोर (जोधपुर) की एक पहाड़ी की ढाल में स्थित एक बावड़ी की दीवार पर अंकित
  • 685 ई. में उत्कीर्ण
  • लेख से ज्ञात होता है उस समय शिव तथा विष्णु की उपासना की जाती थी I
  • मानमोरी का शिलालेख :
  • चित्तौड़ की मानसरोवर झील के किनारे एक स्तम्भ पर अंकित
  • 713 ई. में उत्कीर्ण
  • लेखक – पुष्य
  • उत्कीर्णकर्ता – शिवादित्य
  • खोजकर्ता – कर्नल जेम्स टॉड
  • इस लेख में उस समय के राजाओं द्वारा युद्ध में हाथियों का प्रयोग, शत्रु को युद्ध बंदी बनाना तथा स्त्रियों की अची स्थिति का उल्लेख है I
  • इस लेख में अमृत मंथन का विवरण भी दिया गया है I
  • चाकसू का शिलालेख :
  • जयपुर के निकट चाकसू में स्थित
  • 813 ई. में उत्कीर्ण
  • गुहिल राजाओं की वंशावली का विस्तृत वर्णन
  • बुचकला के शिलालेख :
  • यह जोधपुर के बिलाड़ा में स्थित है I
  • 815 ई. में उत्कीर्ण
  • भाषा – संस्कृत
  • लिपि – उत्तर भारती
  • यह लेख प्रतिहार शासक ‘नागभट्ट द्वितीय’ का है I
  • घटियाला के शिलालेख :
  • जोधपुर में स्थित एक जैन मंदिर के पास यह शिलालेख है जिसे ‘माता का साल’ भी कहा जाता है I
  • 861 ई. में उत्कीर्ण
  • लेखक – मग
  • उत्कीर्णकर्ता – कृष्णेश्वर
  • भाषा – संस्कृत
  • तत्कालीन वर्ण व्यवस्था एवं ‘मग ब्राह्मणों’ का वर्णन
  • राजस्थान में ‘सती प्रथा’ की जानकारी सर्वप्रथम इसी शिलालेख से मिली थी I इसमें राणुका की पत्नी संपल देवी के सती होने का वर्णन है I
  • प्रतिहार शासक ‘कुकुक’ का वर्णन है I
  • आदिवराह मंदिर का लेख :
  • आहड़ (उदयपुर) में स्थित
  • 944 ई. में उत्कीर्ण
  • भाषा – संस्कृत
  • मेवाड़ के शासक भर्तहरी द्वितीय की जानकारी अंकित है I
  • गंगा नदी के अवतरण का उल्लेख है I
  • प्रतापगढ़ का शिलालेख :
  • अग्रवाल की बावड़ी, प्रतापगढ़
  • वर्तमान में अजमेर संग्रहालय में संरक्षित है I
  • 946 ई. में उत्कीर्ण
  • भाषा – संस्कृत व अन्य देशी भाषाएँ
  • शिलालेख में ‘प्रतिहार वंश के शासकों की नामावली’ लिखी है I
  • विशेष रूप से प्रतिहार शासक ‘महेंद्रदेव’ का वर्णन है I
  • इसमें 10वीं सदी के गाँव की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक स्थिति एवं सीमाओं की जानकारी वर्णित है I
  • सांडनाथ/सारनेश्वर प्रशस्ति :
  • आहड़ (उदयपुर)
  • 953 ई. में उत्कीर्ण
  • लेखक – कायस्थ पाल एवं वेलाक
  • भाषा – संस्कृत
  • लिपि – देवनागरी
  • प्रशस्ति में गुहिल वंश के शासक अल्ल्ट की जानकारी अंकित है I
  • औसियां का शिलालेख :
  • जोधपुर के औसियां में स्थित
  • 956 ई. में स्थित
  • इस लेख में समाज  चार वर्णों – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र में विभाजन का उल्लेख है I
  • इसमें मानसिंह को ‘भूमि का स्वामी’ तथा वत्सराज को ‘रिपुओं/शत्रुओं का दमन करने वाला’ कहा गया है I
  • चितौड़ का लेख :
  • 971 ई. में उत्कीर्ण
  • शिलालेख की एक प्रतिलिपि अहमदाबाद के भारतीय मंदिर में संगृहीत है I
  • इस शिलालेख में वर्णित है की स्त्रियों का देवालयों में प्रवेश वर्जित था I
  • नाथ प्रशस्ति :
  • यह शिलालेख उदयपुर के कैलाशपुरी में स्थित लकुलीश मंदिर से प्राप्त हुआ है जो की एकलिंगजी के मंदिर के समीप है I
  • 971 ई. में उत्कीर्ण
  • भाषा – संस्कृत
  • लिपि – देवनागरी
  • विषयवस्तु मेवाड़ की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक जानकारी है I
  • नागदा नगर एवं गुहिल राजाओं का वर्णन है I
  • हर्षनाथ प्रशस्ति :
  • हर्षनाथ मंदिर, रैवासा (सीकर) में स्थित
  • 973 ई. में उत्कीर्ण
  • इस प्रशस्ति के अनुसार हर्ष मंदिर का निर्माण विग्रह्राज के सामंत अल्ल्ट ने करवाया था I
  • प्रशस्ति में चौहान राजाओं के वंशक्रम का वर्णन है I
  • अथूर्णा प्रशस्ति :
  • मण्डलकेश्वर मंदिर, अथूर्णा (बांसवाडा)
  • 1079 ई. में उत्कीर्ण
  • लेखक – विजय
  • इस लेख में बागड़ एवं मालवा के परमार नरेशों का यशोगान है I
  • किराडू का शिलालेख :
  • बाड़मेर के किराडू स्थित शिव मंदिर में उत्कीर्ण
  • 1161 ई. में उत्कीर्ण
  • इस लेख में परमार शासकों की वंशावली का वर्णन है तथा परमार राजपूतों की उत्पत्ति आबू पर्वत पर ऋषि वशिष्ठ द्वारा किये गए यज्ञ से बताई गई है I
  • बिजौलिया का शिलालेख :
  • भीलवाडा जिले के बिजौलिया में पार्श्वनाथ मंदिर के पास स्थित एक चट्टान पर अंकित
  • 1170 ई. में उत्कीर्ण
  • लेखक – गुणभद्र
  • उत्कीर्णकर्ता – गोविन्द
  • निर्माता – जैन श्रावक लोलाक
  • विषयवस्तु – साम्भर एवं अजमेर के चौहानों का वर्णन
  • इस शिलालेख में चौहानों को ‘वत्सगोत्रीय ब्राह्मण’ बताया गया है I
  • इस शिलालेख में उपरमाल के पठार को ‘उत्माद्री’ कहा गया है I
  • इस शिलालेख के अनुसार साम्भर झील का निर्माण चौहान वंश के संस्थापक वत्सराज ने करवाया था I
  • चीरवा का शिलालेख :
  • चीरवा गाँव उदयपुर
  • 1273 ई. में उत्कीर्ण
  • रचयिता – रत्न्प्रभसूरि
  • विषय – मेवाड़ के गुहिल वंशी शासकों की वंशावली एवं कीर्ति का गुणगान
  • अचलेश्वर शिलालेख :
  • सिरोही में स्थित
  • 1285 ई. में उत्कीर्ण
  • लेखक – शुभचंद्र
  • उत्कीर्णकर्ता – कर्म सिंह सूत्रधार
  • भाषा – संस्कृत
  • शैली – पद्य
  • गुहिल वंश की बप्पा रावल से लेकर समर सिंह तक सभी शासकों की जानकारी दी गई है I
  • इस शिलालेख में वर्णन है कि “बप्पा रावल द्वारा यहाँ दुर्जनों का संहार किया गया जिनकी चर्बी/मेद से यहाँ की भूमि गीली हो गई अतः इसका नाम ‘मेदपाट’ पड़ा” I
  • श्रंगी ऋषि शिलालेख :
  • कैलाशपुरी (उदयपुर) में स्थित
  • 1428 ई. में उत्कीर्ण
  • लेखक – कवि राजवाणी विलास
  • यह लेख राणा मोकल के समकालीन है जब उन्होंने अपनी पत्नी की मुक्ति के लिए श्रंगी ऋषि के स्थान पर कुंद बनवा कर पत्नी की मूर्ति की प्रतिष्ठा करवाई थी I
  • यह शिलालेख मेवाड़ के महाराणाओं के बारे में विस्तृत वर्णन करता है I
  • इसमें उल्लेख है की राणा लाखा ने काशी, गया एवं प्रयाग जाने वाले हिन्दुओं से कर हटवाकर इन तीनो स्थानों पर शिव मंदिर का निर्माण कराया था I
  • इस शिलालेख में भीलों के सामाजिक जीवन का भी वर्णन किया गया है I
  • रणकपुर प्रशस्ति :
  • रणकपुर (पाली) के चौमुखा जैन मंदिर में स्थित
  • 1439 ई. में उत्कीर्ण
  • भाषा – संस्कृत
  • लिपि – देवनागरी
  • बप्पा रावल से राणा कुम्भा तक के शासकों की उपलब्धियों का वर्णन
  • इस लेख में बप्पा रावल और कालाभोज को पृथक व्यक्ति बताया है I
  • कुम्भलगढ़ प्रशस्ति :
Travel with sharad vyas: महाराणा कुम्भा से ...
  • कुम्भलगढ़ दुर्ग के कुम्भा श्याम मंदिर में स्थित  , वर्तमान में उदयपुर संग्रहालय में संरक्षित
  • 1460 ई. में उत्कीर्ण
  • यह मेवाड़ के महाराणाओं की वंशावली का सबसे विश्वसनीय स्रोत है I
  • इसमें बप्पा रावल को ब्राह्मण वंशीय/विप्र वंशीय बताया गया है I
  • हम्मीर को ‘विषम घाटी पंचानन’ इसी प्रशस्ति में कहा गया है I
  • यह प्रशस्ति महाराणा कुम्भा के लेखन पर विस्तृत प्रकाश डालती है I
  • कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति :
  • चित्तौडगढ में स्थित
  • 1460 ई. में उत्कीर्ण
  • अन्य नाम – जय प्रशस्ति
  • लेखक – अत्रि एवं महेश भट्ट
  • भाषा – संस्कृत
  • विषयवस्तु – हम्मीर से लेकर कुम्भा तक के शासकों का वर्णन
  • कुम्भा द्वारा रचित सभी ग्रंथों का उल्लेख
  • कुम्भा की उपाधियों यथा दानगुरु, हालगुरु, छापगुरु, राजगुरु, शैलगुरु एवं हिन्दु सुतारण आदि का उल्लेख है I
  • बीकानेर प्रशस्ति :
  • बीकानेर के जूनागढ़ दुर्ग के मुख्या द्वार पर उत्कीर्ण
  • प्रशस्ति के दोनों ओर जयमल एवं फत्ता की मूर्तियाँ लगी हैं I
  • 1504 ई. में उत्कीर्ण
  • निर्माता – राजा रायसिंह राठौड़
  • भाषा – संस्कृत
  • इसमें राव बीका से रायसिंह तक के सभी राजाओं की विस्तृत जानकारी एवं भवन निर्माण आदि का उल्लेख है I
  • आमेर का लेख :
  • आमेर में स्थित
  • 1612 ई. में उत्कीर्ण
  • इसमें आमेर के कछवाहा वंश का वर्णन है तथा उनके लिए ‘रघुवंश तिलक’ शब्द का प्रयोग किया गया है I
  • जगन्नाथ प्रशस्ति :
  • जगदीश मंदिर (उदयपुर) के मुख्य द्वार पर उत्कीर्ण
  • 1625 ई. में उत्कीर्ण
  • विषय वस्तु – बप्पा रावल से राणा जगतसिंह तक का विवरण
  • हल्दीघाटी युद्ध का उल्लेख
  • जगत सिंह की दानशीलता का वर्णन
  • राज प्रशस्ति :
  • राजसमन्द जिले की राजसमन्द झील के उत्तरी भाग ‘नौ चौकी पाल’ में 25 शिलाओं पर उत्कीर्ण है I
  • 1676 ई. में उत्कीर्ण
  • एशिया की सबसे बड़ी प्रशस्ति एवं शिलालेख
  • लेखक – रणछोड़ भट्ट
  • भाषा – संस्कृत
  • विषय वस्तु – मेवाड़ राजपरिवार की वंशावली
  • जगत सिंह एवं राज सिंह की उपलब्धियों का वर्णन, जहांगीर एवं अमरसिंह की ‘मुग़ल-मेवाड़ संधि’ का उल्लेख , अकाल राहत हेतु राज सिंह द्वारा राजसमन्द झील के निर्माण का उल्लेख
  • बैद्यनाथ प्रशस्ति :
  • पिछोला झील के किनारे बैद्यनाथ मंदिर में उत्कीर्ण
  • 1719 ई. में उत्कीर्ण
  • लेखक – रूप भट्ट
  • इसमें बप्पा रावल से लेकर राणा संग्राम सिंह तक के सभी शासकों का संक्षिप्त विवरण है I
  • इसमें हरित ऋषि के आशीर्वाद से बप्पा रावल को मेवाड़ का राज्य प्राप्त होना बताया गया है I
  • राणा सांगा व मुग़ल सेनापति रणबाज़ खान के मध्य बांदनवाड़ के युद्ध का उल्लेख किया गया है I