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राजस्थान का इतिहास- प्रमुख पुरातात्विक स्थल एवं सभ्यताएं- भाग 2

आहड़ सभ्यता

परिचय

  • आहड़ सभ्यता को ‘बनास की सभ्यता’ भी कहा जाता है I
  • आहड़ के अन्य प्राचीन नाम –    ताम्रवती नगरी

धूलकोट (स्थानीय नाम)

आघाटपुर (10वीं-11वीं शताब्दी का नाम )

  • आहड़ की सभ्यता लगभग ४००० वर्ष पूर्व आहड़ नदी के किनारे विकसित हुई थी चूंकि आहड़ नदी बनास नदी में मिल जाती है इसलिए इसे ‘बनास की सभ्यता’ भी कहते हैं I
  • आहड़ सभ्यता एक ग्रामीण सभ्यता है I
  • आहड़ सभ्यता के कालखंड को दो भागों में बांटा गया है

प्रथम कालखंड ‘ताम्रयुगीन सभ्यता’ का द्द्योतक है

द्वितीय कालखंड में आहड़ वासी लोहे का प्रयोग करने लगे थे अतः लौह संस्कृति का प्रवेश हो चुका था I

उत्खनन

  • आहड़ सभ्यता की खोज 1953-54 में अक्षय कीर्ति व्यास ने की थी I
  • प्रथम उत्खनन 1953-54 में रतन चन्द्र अग्रवाल द्वारा
  • द्वितीय उत्खनन 1961-६२ में एच.डी. सांकलिया व वी.एन. मिश्रा द्वारा
  • आहड़ की खुदाई में सभ्यता के तीन चरणों का ज्ञान हुआ है

प्रथम चरण में स्फटिक के पत्थरों की बहुतायत रही

द्वितीय चरण में तांबे-कांसे एवं लोहे के उपकरण मिले

तृतीय चरण में भिन्न भिन्न प्रकार के मृदभाण्ड मिले

निवास स्थान

  • यहाँ 40 फीट खुदाई पर 8 बार बस्तियों के बसने व उजड़ने के प्रमाण मिले हैं I
  • आहड़ वासियों के घर आयताकार थे I कमरे बड़े व छतें कच्ची होती थीं I मकानों की दीवारों को मिट्टी से पोता जाता था तथा काली-पीली मिट्टी व गोबर के मिश्रण से फर्श बनाये जाते थे I
  • मकानों में एक से अधिक चूल्हे मिलने से संयुक्त परिवार व्यवस्था का अनुमान लगाया गया है I
  • एक घर में एक साथ 6 चूल्हे मिले हैं जिनमें से एक पर ‘मानव हथेली की छाप है I एक से अधिक मुख के चूल्हे भी मिले हैं I
  • मकानों में अनाज रखने के विशाल भांड भी मिले हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘गोरे’ व ‘कोठे’ कहा जाता था I

व्यवसाय एवं व्यापार

  • आहड़ के घरों से तांबे के कुल्हाड़े व अस्त्र मिले हैं , तांबा गलाने की भट्टियाँ मिली हैं I समीप के क्षेत्र में तांबे की खानें थीं अर्थात यहाँ के निवासियों का प्रमुख व्यवसाय तांबा गलाना एवं उसके उपकरणों का निर्माण था I
  • प्रमुख रूप से आहड़ वासी धातुकर्मी थे I
  • आहड़ से यूनान के तांबे के सिक्के मिले हैं जिनमे एक ओर त्रिशूल एवं दूसरी ओर अपोलो अंकित है जिससे विदेशी व्यापार का अनुमान होता है I
  • डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार आहड़ के लोग कृषि से परिचित थे I
  • खुदाई में प्राप्त कपड़ों पर छपाई करने के ठप्पों से ज्ञात होता है की वस्त्रों की रंगाई छपाई का उद्योग भी अस्तित्व में था I
  • उत्खनन में माप तौल के बाटों का मिलना व्यापार एवं वाणिज्य की विकसित अवस्था दर्शाता है I

धर्म एवं संस्कार

  • आहड़ से मातृदेवी की मूर्ति प्राप्त हुई है I
  • खुदाई में पूजा के दीपक का मिलना अनुष्ठान में दीपक जलाने की प्रथा को इंगित करता है I
  • यहाँ टेराकोटा से निर्मित वृषभ (बैल) की आकृतियाँ मिली है जिन्हें ‘बनासियन बुल’ की संज्ञा दी गई है I
  • आहड़वासी शवों को आभूषणों सहित गाड़ते थे जिनका सिर उत्तर में व पैर दक्षिण में होते थे I

सामाजिक जीवन

  • आहड़ के लोग भोजन को पकाने की कला से परिचित थे I
  • गेहूं, चावल एवं ज्वार प्रमुख खाद्द्यान थे I
  • चूल्हे के पास से जानवरों की अस्थियाँ मिलना यहाँ के निवासियों में मांसाहार की
  • प्रवृति दर्शाता है I
  • यहाँ के निवासी लाल एवं काले मृदभांडों का प्रयोग करते थे जिनको उलटी तिपाई विधि (ज्वलन विधि) से पकाया जाता था I बलुए के सिल बट्टे के अवशेष भी मिले हैं I
  • आहड़ के लोग आभूषणों के शौक़ीन थे I मणियों एवं पकी हुई मिट्टी के मणकों के आभूषण प्रचलन में थे I कीमती पत्थरों जैसे गोमेद, स्फटिक आदि से मणियाँ बनायीं जाती थीं I
  • यहाँ से सीप, कांच, मिट्टी, कौड़ी एवं स्फटिक से निर्मित 26 प्रकार की कलात्मक मणियाँ मिली हैं I

उत्खनन में प्राप्त अन्य महत्वपूर्ण वस्तुएं

  • सींग वाले पशु, हाथी, गैंडा, मेढ़ा, मनुष्य एवं श्वान की आकृति के खिलौने
  • तांबे की कुल्हाड़ियाँ, फलक, बांस के टुकड़े, हड्डियाँ, चाक, तांबे की मुद्राएँ
  • बिना हत्थे के छोटे जलपात्र , चूंकि इसे जलपात्र ईरान में होते थे अतः इन जलपात्रों का मिलना ईरान से संबंध दर्शाता है I
  • चक्रकूप – यह आहड़ सभ्यता की एक विशेषता है I 15-20 फीट गहरा गड्ढा खोदकर उसमें एक के ऊपर एक घड़े रखकर पानी सोखने के लिए जो शोषण पात्र बनाया जाता था उसको चक्रकूप कहते थे I
  • राजस्थान के बाहर आहड़ सभ्यता का प्रसार गुजरात एवं मध्य प्रदेश में पाया गया है I
  • आहड़ (उदयपुर) में आहड़ संग्रहालय की स्थापना की गई है I
आहड़ संग्रहालय, उदयपुर

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