राजस्थान का इतिहास- प्रमुख पुरातात्विक स्थल एवं प्राचीन सभ्यताएं- भाग 3

III गणेश्वर सभ्यता

परिचय

  • गणेश्वर, राजस्थान के सीकर जिले के नीम का थाना में स्थित है I
  • गणेश्वर सभ्यता 2800 ई.पू. में कांतली नदी के किनारे विकसित हुई थी I
  • भारत में ‘ताम्र युगीन सभ्यताओं’ के जितने भी केंद्र मिले हैं उनमें गणेश्वर सबसे प्राचीन है अतः इसको ‘ताम्र युगीन सभ्यताओं की जननी’ कहा जाता है I
  • यह एक नगरीय सभ्यता है

उत्खनन

  • गणेश्वर सभ्यता का उत्खनन 1997-78 ईस्वी में रतन चन्द्र अग्रवाल एवं विजय कुमार के निर्देशन में किया गया था I

उत्खनन में प्राप्त अन्य महत्वपूर्ण सामग्री

  • गणेश्वर से भारी मात्रा में तांबे के औज़ार यथा कुल्हाड़ी, चाक़ू, बरछी, भाला, मछली पकड़ने के कांटे, फरसे, केशपिन, अंजन श्लाकाएँ (काजल लगाने की बारीक छड), बाणग्र आदि मिले हैं I
  • गणेश्वर में ईंटों का प्रयोग बिलकुल नहीं हुआ है I मकानों का निर्माण पत्थर से किया जाता था I
  • चूंकि यहाँ पत्थर के औज़ार भी काफी मात्रा में मिले हैं अतः गणेश्वर को ‘ताम्र-पाषाण युगीन सभ्यता’ भी कहा जाता है I
  • यहाँ से विशिष्ट प्रकार के ‘ मिट्टी के छल्लेदार बर्तन’ मिले हैं I

IV बैराठ सभ्यता

परिचय

  • बैराठ, जयपुर जिले में जिला मुख्यालय से लगभग 85 किमी की दूरी पर स्थित है I
  • बैराठ का प्राचीन नाम ‘विराटनगर’ था I
  • यह एक ‘ग्रामीण सभ्यता’ थी I

उत्खनन

  • बैराठ का उत्खनन दो चरणों में किया गया

प्रथम – 1936-37 ईस्वी में दयाराम साहनी द्वारा

द्वितीय – 1962-63 ईस्वी में नीलरत्न बनर्जी व कैलाशनाथ दीक्षित द्वारा

   पाषाणकालीन सभ्यता का स्थल

  • बैराठ में अनेक शैल चित्र मिले हैं जो पाषाणकाल की विशेषता थी I
  • गुफाओं में चट्टानों की दीवारों पर ‘शिकार करते मानव’ के चित्र अंकित हैं I

महाभारतकालीन स्थल

  • चूंकि महाभारत में अनेक बार ‘विराटनगर’ का उल्लेख हुआ है अतः माना जाता है की पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय यहाँ व्यतीत किया था I
  • बैराठ में एक छोटी पहाड़ी है जिसे ‘भीमसेन की डूंगरी’ कहा जाता है जिस पर स्थित ‘भीमताल’ नामक एक बड़े गड्ढे में पानी भरा रहता है I मान्यता है की द्रौपदी की प्यास बुझाने के लिए भीम ने चट्टान पर लात मारकर पानी निकाला था I
बैराठ स्थित बौद्धस्तूप के अवशेष
  • प्राचीन ग्रंथों में विराटनगर ( बैराठ ) का उल्लेख ‘मत्स्य जनपद की राजधानी’ के रूप में किया गया है I इसका विस्तार जयपुर, दौसा, अलवर और भरतपुर तक था I

  मौर्यकालीन सभ्यता का स्थल

बैराठ से ऐसी अनेक वस्तुएं मिली हैं जो इस स्थल का मौर्यकाल से संबंध सिद्ध करती हैं I

  • बैराठ में स्थित ‘बीजक की डूंगरी(पहाड़ी)’ से मौर्य शासक ‘अशोक’ के काल के ‘चैत्य’ (गोल बौद्ध मंदिर), ‘बौद्ध स्तूप’ व ‘बौद्ध मठ’ के अवशेष मिले हैं I
  • ये सभी अवशेष बौद्ध धर्म की ‘हीनयान शाखा’ से सम्बंधित हैं I
बैराठ स्थित बौद्धस्तूप के अवशेष
  • भाब्रू पहाड़ी’ से अशोक के दो स्तम्भ लेख मिले हैं जो ब्राह्मी लिपि में हैं I
  • जयपुर नरेश सवाई रामसिंह के काल में इस स्थल के उत्खनन में एक ‘स्वर्ण मंजूषा’ मिली थी जिसमे भगवान बुद्ध की अस्थियों के अवशेष संरक्षित थे I

मुग़ल काल से संबंध

  • बैराठ से एक सराय तथा मुगलकालीन छतरी के अवशेष मिले हैं I बादशाह अकबर अपनी अजमेर यात्रा के दौरान यहाँ विश्राम किया करता था I
  • अकबर ने यहाँ एक टकसाल का निर्माण भी कराया था जहाँ अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ के काल के सिक्के ढलते थे I

उत्खनन में प्राप्त अन्य महत्वपूर्ण सामग्री

  • एक खंडरनुमा भवन मिला है जिसमे 6-7 कक्ष हैं संभवतः यह बौद्ध मठ रहा होगा I
  • भवन निर्माण में ईंटों का अधिक प्रयोग हुआ है I
  • शंख लिपि के प्रचुर प्रमाण मिले हैं I
  • बैराठ से सूती कपडे में बंधी मुद्राएँ मिली हैं I
  • कुल 36 मुद्राएँ मिली हैं इनमे से 8 चाँदी की पंचमार्क/आहत मुद्राएँ तथा 28 तांबे की मुद्राएँ हिन्द-यूनानी शासक मीनेंडर/मिलिंद की हैं I अर्थात यूनान से व्यापारिक संबंध थे अथवा यहाँ मिलिंद का शासन रहा होगा I

अन्य

  • बैराठ सभ्यता का अंत ‘विदेशी हूणों के आक्रमण’ को मन जाता है I
  • चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में बैराठ की यात्रा की थी I

V रंगमहल सभ्यता

परिचय

  • यह सभ्यता राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी (प्राचीन नाम सरस्वती नदी) के किनारे विकसित थी I
  • रंगमहल को ‘राजस्थान का एकमात्र कुषाणकालीन स्थल’ कहा जाता है I
  • रंगमहल से कुषाण कालीन एवं पूर्व गुप्तकालीन युग के अवशेष मिले हैं I

उत्खनन

  • इस स्थल का उत्खनन डॉ. हन्नारिड के निर्देशन में एक स्वीडिश दल द्वारा वर्ष 1952-54 ईस्वी में किया गया था I

कुषाण काल से संबंध

  • रंगमहल से ईएसआई अनेक वस्तुएं मिली है जो कुषाण काल से इसका संबंध सिद्ध करती हैं यथा :

गांधार शैली की मिट्टी की मूर्तियाँ – इसमें एक शिक्षक व शिष्य की मूर्ति उल्लेखनीय है

कनिष्क I व कनिष्क III के काल की तांबे की 105 मुद्राएँ

पंच मार्क सिक्के

  सामाजिक जीवन

  • चावल की खेती की साक्ष्य इस बात का प्रमाण है की कृषि यहाँ का मुख्या व्यवसाय था एवं चावल मुख्य खाद्द्यान था I
  • शिकार के उपकरणों यथा लोहे की दांतली, भाले आदि के मिलने से अनुमानित है की यहाँ के लोग मांसाहार का सेवन करते होंगे I
  • घंटाकार मृद्पात्र, टोंटी लगे घड़े इस सभ्यता की विशिष्ट वस्तुएं हैं I
रंगमहल से प्राप्त मृद भांड़ों के रेखा चित्र
  • रंगमहल में लाल और गुलाबी रंग के मृद्पात्र मिले हैं जिन पर काले रंग से चित्रण किया गया है I
  • यहाँ से कांसे एवं लोहे की अंगूठियाँ, बाजूबंद, ताबीज आदि मिले हैं अर्थात रंगमहल की निवासी आभूषण प्रेमी थे I
  • प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर माना गया है कि नृत्य तथा जुआ यहाँ के निवासियों के मनोरंजन के प्रमुख साधन थे I

धर्म

  • रंगमहल से मातृदेवी, शिव एवं कृष्णा भक्ति के साक्ष्य मिले हैं I
  • घंटानाद तथा प्रार्थना, भक्ति के प्रमुख साधन थे I
  • धूप, दीपक, नैवेद्य, घंटियों के अवशेष मिले हैं I

अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य

  • रंगमहल से कांसे की दो सील/मुहरें मिली हैं जिनकी आयु लगभग 300 ईस्वी आंकी गयी है I
  • हनुमानगढ़ जिले में ‘बड़ोपल’ तथा ‘डाबरी’ नामक स्थानों पर भी रंगमहल के समान पुरातात्विक अवशेष मिले हैं I

VI बालाथल सभ्यता

परिचय

  • उदयपुर जिले की वल्लभनगर तहसील के बालाथल नामक गाँव में स्थित
  • ताम्र-पाषाणकालीन सभ्यता
  • यह हड़प्पा सभ्यता के पश्चात् स्वतंत्र रूप से विकसित सभ्यता थी I

उत्खनन

  • 1962-63 ईस्वी में डॉ.वी.एन.मिश्र ने इस सभ्यता की खोज की थी I
  • वर्ष 1993 में डॉ.वी.एन.मिश्र के निर्देशन में डॉ.वी.एस.शिंदे , डॉ.आर.के.मोहंती एवं डॉ. देव कोठारी(राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर) द्वारा इस स्थक का उत्खन किया गया I

भवन एवं दुर्ग

  • बालाथल से 11 कक्षों का एक विशाल भवन मिला है I
  • एक दुर्ग जैसी संरचना के अवशेष मिले हैं I
  • दुर्ग की दीवारें मोटी तथा मिट्टी से निर्मित हैं I
  • भवन आदि के निर्माण में कच्ची ईंटों का प्रयोग हुआ है I
  • मकानों में फर्श में वृताकार गड्ढे तथा मिट्टी की विशाल कोठियां (20 से 50 सेमी.) मिली हैं जिनमे अनाज का भण्डारण किया जाता होगा I

सामाजिक जीवन

  • बालाथल में तांबे की प्रचुरता के कारण अधिकाँश उपकरण एवं आभूषण तांबे के मिले हैं I
  • एक लोहा गलाने की भट्टी मिली है I
  • यहाँ से कुत्ते एवं बैल की मृण्मूर्तियों के मिलने से अनुमान लगाया गया है की गाय, बैल एवं कुत्ता पालतू पशु थे I
  • बालाथल से एक कंकाल प्राप्त हुआ है जो योग मुद्रा में बैठा है I इस योगी कंकाल की आयु 2700 ईसा पूर्व आंकी गयी है I
बालाथल से प्राप्त योगी कंकाल

भोजन एवं व्यवसाय

  • कृषि, शिकार एवं पशुपालन बालाथल निवासियों के प्रमुख व्यवसाय थे I
  • गेहूं, मूंग व सरसों प्रमुख फसलें थीं I
  • उत्खनन में सिल बट्टा मिला है अर्थात अनाज कूटने पीसने के लिए सिल बट्टा प्रयुक्त होता था I
  • बैराठ के अतिरिक्त बालाथल ऐसा स्थल है जहाँ से बुने हुए वस्त्र का अवशेष मिला है अर्थात वस्त्र बुनाई उद्योग भी अस्तित्व में था I
  • बालाथल से विशिष्ट प्रकार के चमकदार पॉलिश के मिट्टी के बर्तन मिले हैं जिनमे कुछ की सतह खुरदरी है कुछ की चिकनी है I

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